मेरी कविताएं मेरे विचार बैद्यनाथ धाम- शर्मा भगवंत

मेरी कविताएं मेरे विचार बैद्यनाथ धाम- शर्मा भगवंत

तीर्थो में प्रसिद्ध जो पब्लिक- ए आम है,
हम सब पहुंचे वहीं ,बाबा जो धाम है ।
घुमड़े बादल , बारिश हुई,
हुई मौसम के, मिजाज में कुछ नरमी
वैसे था, जून का महीना, चढ़ते सूर्य की गर्मी

हमने ए सी लॉज बुक करने को किया था सर्च
सोचा था होगी , एक्स्ट्रा कुछ खर्च
पर इस बंजर को , आज बारिश ने सिंचा दिया था
जैसे आसमान ने ,कूलर का आंचल बिंछा दिया था।
चारों ओर फैले , कुछ बादल घनघोर थे
पूरा देवघर ही , ए सी में सराबोर थे।

पूरा मंदिर परिसर पैक्ड,
रात्रि सात का, थाह जोह रहा था
और शिव जी का श्रंगार
पूरे भीड़ का मन मोह रहा था।

दृश्य देख बड़ी खुश, मा भारती हो रही थी
क्यूंकि औघड़ दानी शिव की ,आरती हो रही थी

उड़ रही उस बक्त,भक्ति परफ्यूम थे,
ढोल नगाड़ों की ,चारो ओर धूम थे।

मंदिर परिसर में शुबह, नजारे कुछ और थे
इमारतें थी कंपित, ऐसे कुछ शोर थे ।
दिखे ऐसे भी पंडे, अपना रहे हथकंडे।
तैनात थी पुलिस, थी हाथ में डंडे।
पंडे कुबेर की थैली को, ऐसे सेंच रहे थे
२ ₹ की पानी , कहीं १० तो कहीं
२० में बेंच रहे थे ।
यहां के पंडे रोड से ही संकेत , साइन लगा रहे थे
हम भर लोटे में पानी, लम्बी लाइन लगा रहे थे।
दर्शनार्थियों की हो गई, खड़ी उनकी खाट थी
लाइन जहां शुरू हुई, धोबियों की घाट थी।

कितनों को दूर से ही, शिव को चूमने पडे थे ।
घंटों जलेबी की तरह ,लाइन में घूमने पड़े थे।
कितनों के साथ टक्कर, कितनों के साथ घर्षण हुए,
४ घंटे मैराथन के बाद , शिव जी के दर्शन हुए ।

बोल बम की ध्वनि, सभी के साथ की जय हो,
तो बोलिए मिलकर, बैद्यनाथ की जय हो।

 

 

  शर्मा भगवंत

आसनसोल, पश्चिम बंगाल 

 

 

 

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