चाहे जितना लिख लूँ मैं – मंजीत

चाहे जितना लिख लूँ मैं – मंजीत

चाहे जितना लिख लूँ मैं,
कम ही पड़ता हैं, तुम्हे समझाने को,
विचार तो बहुत आते हैं,
पर मन नही करता बतलाने को,
लिखता हूँ कविताए मैं, तुम्हे ही पढ़ाने को ।

नही हो अधिक दूर तुम,ना ही अधिक पास हो,
नही आता कोई मनाने को,
तो मन नही करता रूठ जाने को,
लिखता हूँ कविताएँ मैं, तुम्हे ही पढ़ाने को ।

यूँ तो एक कवि, शब्दों से भरा होता हैं,
जब भी आ जाती हो सामने,
शब्द नही बचते सुनाने को,
लिखता हूँ कविताएँ मैं, तुम्हे ही पढ़ाने को।

कैसे ना सोऊ रातो मैं,
जब संग स्वप्न हो तेरी बातो के,
मन नही करता स्वयं को,
उस आनंदमयी नींद से जगाने को,
लिखता हूँ कविताएँ मैं, तुम्हे ही पढ़ाने को।

मंजीत
रतलाम, मध्य प्रदेश

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