चल एक दुआ लीख डालूँ-सुजीत कुमार

चल एक दुआ लीख डालूँ-सुजीत कुमार

चल एक दुआ लीख डालूँ
महफिलें खुशनुमा लिख डालूं
तेरे दर्द का किसको क्या पड़ी हैं।
दर्द को मैं कैद करवा लूं
मुस्कानो से बस एक पहर का
रुठा हुआ जीवन सजा लूं।

सुख गयी है अब नैना
दिल भी उदास पड़ा है
अब तो खेलने के खातिर
चांद और तारे मंगा लूं
चल एक दूआ लिख डालूं
महफिलें खुशनुमा लिख डालूं

सुबह है कुछ करने की चिन्ता
शाम भी है थका सा।
आंखें भी है टिकी हुई
और सब कुछ है रुका सा
दिल में ये जज़्बात दबी है
कुछ तो मैं ऐसा कर डालूं
चल एक दूआ लिख डालूं
महफिलें खुशनुमा लिख डालूं
मुस्कानो से बस एक पहर का
चल रुठा हुआ जीवन सजा लूं।।

छलनी – छलनी ये दिल हूई हैं
तन्हा अब महफिल हुई है।
रौनके इस दिल की दुनिया
मुदते धूमिल हुई है
ख्वाहिशें तो कह रही
फुर्सत से कभी इसे रंगवा लूं
चल एक दूआ लिख डालूं
महफिलें खुशनुमा लिख डालूं

 

सुजीत कुमार

हलिवन्ता, झारखण्ड

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