चलते चलते-विश्वम्भर व्यग्र

चलते चलते-विश्वम्भर व्यग्र

ताव चुराते

साहित्य समुंदर

पार करन को

वो शब्दों की

नाव चुराते

हाथ- सफाई

ऐसी करते

अच्छे-अच्छे

गच्चा खाते

सूरज-चंदा

छिपे ओट में

बादल अपना

रोब जमाते

कहीं से शब्द

कहीं से पंक्ति

भानुमता यूं

कविता बनाते

मंचों पर

छाजाते जैसे

आसमान पर

बादल छाते

चोर-चोर

मौसेरे भाई

अलग अपनी

बिसात जमाते

व्यग्र आज भी

व्यग्र है देखो

अच्छे दिन

उसके ना आते

विश्वम्भर व्यग्र पाण्डे

गंगापुर, राजस्थान 

 

 

 

 

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