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चापलूस-सुनील-दुबे

दिल में नफरत और क्रोध,
झूठी मुस्कान दिखाते हैं।
कभी मौका पाकर वार करें,
कभी पैरों में गिर जाते हैं।

सुसुप्त अवस्था में रहते,
काम अपना कर जाते हैं।
अनुकूल अवस्था पाते ही,
लोगों का हक खा जाते हैं।

विष व्यंग बाण धारण करते,
हित अपना साधता जाते हैं।
जब उन पे आंच आ जाये तो,
साथी को बलि चढाते हैं।

छल, दंभ, कपट से भरा हुआ,
हर पल षडयंत्र रचाते हैं।
औरों को डसते – डसते,
अपनों को भी डस जाते हैं।

गजब की कार्य शैली इनकी,
इतिहास गवाही देता है।
घाती जयचंद को याद करो,
गोरी का साथ जो देता है।

सत्रह सौ साल गुलामी का,
सब श्रेय इन्हीं को जाता है।
सीधे सच्चे लोगों को,
उनके पथ से भटकाता है।
✍ सुनील दुबे
जौनपुर (उ.प्र.)

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