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छत्तीसगढ़ का राजगीत-वीरेंद्र देवांगना

छत्तीसगढ़ का राजगीतःः
अरपा पैरी के धार, महानदी अपार।
इंदिरावती हा पखारय तोर पईयां
महूं पांवे परंव तोर भुंइयां।
जय हो, जय हो, छत्तीसगढ़ मईया।
सोहय बिंदिया सहीं, घाट डोंगरी पहार।
चंदा सुरूज बनय तोर नैना
सोनहा धाने के अंग, लुगरा हरिहर हे रंग।
तोर बोली हावय सुग्धर मैना
अंचरा तोर डोलावय पुरवईयां।
महूं पांवे परंव तोर भुइयां
जय हो, जय हो, छत्तीसगढ़ मईया।
रयगढ़ हावय सुग्धर, तोरे मउरे मुकुट।
सरगुजा अउ बिलासपुर हे बइहां
रयपुर कनिहा सही घाते सुग्धर फबय।
दुरुग बस्तर सोहय पैजनियां
नांदगांव नवा करधनिया।
महूं पांवे परव तोर भुंइया
जय हो, जय हो, छत्तीसगढ़ मईया।
उपर्युक्त गीत को छग सरकार ने राजगीत की घोषणा की है, जो राज्य सरकार के महत्वपूर्ण सरकारी कार्यक्रमों व आयोजनों में गाया-बजाया जाता है। राजगीत के रचयिता स्वर्गीय डाॅ. नरेंद्रदेव वर्मा हैं।
वर्माजी का जन्म 4 नवंबर 1939 को वर्धा के सेवाग्राम में हुआ था। उनके पिता स्व. धनीराम वर्मा स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। स्व. धनीराम वर्मा के पांच पुत्रों में-से एकमात्र विवाहित पुत्र डाॅ. नरेंद्रदेव वर्मा ही थे।
डाॅ. नरेंद्रदेव वर्मा की पुत्री मुक्तेश्वरी का विवाह छग के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के साथ 3 फरवरी 1982 को हुआ।
स्व. डाॅ नरेंद्रदेव वर्मा कवि, नाटककार, उपन्यासकार, कथाकार, समीक्षक और भाषाविद थे। उनका छत्तीसगढ़ी गीत संग्रह अपूर्वा है।
इनके अतिरिक्त सुबह की तलाश (हिंदी उपन्यास), छत्तीसगढ़ी भाषा का उद्विकास, हिंदी स्वछंदवाद प्रयोगवादी, नई कविता सिद्धांत व सृजन, हिंदी नव स्वच्छंदवाद आदि प्रकाश्य ग्रंथ हैं।
उनका ‘मोला गुरु बनई लेते’ छत्तीसगढ़ी प्रहसन अत्यंत लोकप्रिय हुआ। 8 सितंबर 1979 को महज 40 साल की उम्र में डा. नरेंद्रदेव वर्मा का रायपुर में देहावसान हो गया।
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