धीरे-धीरे – पंकज साहू

धीरे-धीरे – पंकज साहू

क्यों जन्मे हो इस धरती पर,
यह एहसास करा रही है धीरे-धीरेl
यह जिंदगी मेरा नया मुकाम,
बना रही है धीरे-धीरेl
गलतियां जो नजरअंदाज की अब तक ,
वह भी समझ आ रही है धीरे धीरेl
जो ठोकर लग रही है मुझको ,
वह संघर्ष करना सिखा रही है धीरे-धीरे l
जो लोग रखते हैं नकाब चेहरे पर,
उनका भी चेहरा पढ़ना सिखा रही है धीरे-धीरेl जो लोग हंसते हैं मुझ पर,
उन्हें भी उनकी औकात बता रही है धीरे-धीरेl सफलता पाने का कोई शॉर्टकट नहीं,
मेहनत करना सिखा रही है धीरे-धीरेl
दुनिया की समझ मुझ में भी आ रही है धीरे-धीरेl
यह जिंदगी सफलता की ओर,
कदम बढ़ा रही है धीरे-धीरेl
अपनी क्षमताओं को पहचानना,
सीखा रही है धीरे-धीरेl

पंकज साहू
भोपाल

Ravi Kumar

मैं रवि कुमार गुरुग्राम हरियाणा का निवासी हूँ | मैं श्रंगार रस का कवि हूँ | मैं साहित्य लाइव में संपादक के रूप में कार्य कर रहा हूँ |

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