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दोस्ती- बलराम सिंह

मै यादौ की पुस्तक खोलू तो,बचपन की लम्हा घोलू तो
एक यार दिखाई देता है,एक प्यार दिखाई देता है।

वो दिन भी क्या दोस्ताना था,मिल कर साथ निभाना था
हर पल साया बनकर रहते थे,कभी नहीं बिछड़ते थे।

पढ़ना खेलना साथ साथ,घूमना लेकर हाथ में हाथ
मस्ती भरी दोस्ताना था,मित लगता पुराना था।

दो जिस्म एक जान थे,संग जीने का अरमान थे
खुल कर हम बतियाते थे,कोई राज नहीं छुपाते थे।

नजाने कब दोस्ती ठहर गई,बचपन कब जबानी में ढाल गई।
अजनबी शहर में सब गुम हो गए,खुशी के सागर में अब गम रह गए।

अब शिर्फ यादें बन कर रह गए, दुनियां के नये शिरे में ढाल गए
दिल रोता नैन बरसते हैं, मन मित मिलन को तरस्ते है।

दोस्ती तो अनमोल रतन,इसे नहीं तोल सकता धन
ये लम्हों का बेला हैं, मन लगता बड़ा अकेला हैं।

यादों की पुस्तक खोलू तो,बचपन की लम्हा घोलू तो
एक यार दिखाई देता है,एक प्यार दिखाई देता है।

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Balram-Singh

Balram-Singh

मै प्राथमिक शिक्षा अपने गांव बैद्यनाथ पूर से किया 10 वीं की शिक्षा ओंकार उच्च विद्यालय सुपौल बिरौल से की इंटर की शिक्षा जनता कोसी महा विद्यालय से की मुझे 16 वर्ष की उम्र से ही कविता लिखने का शौक रहा है 2010 से लेकर अभी तक कई सारे रचनाए हमने लिखी है अभी फिलहाल हम मुंबई में जॉब करते हैं और समय मिलने पर कविता भी लिखते हैं

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