दिल के धागे – राकेश मेनारिया

दिल के धागे – राकेश मेनारिया

दिल के धागे कितने मजबूत थे
सब साथ रहते न जाने कितने अटूट थे।
जीवन की कहानियां इन्ही से शुरू होती है,यह दिल के करीब थे
दिल के धागे कितने मजबूत थे।
ना कोई फरेब था ना कोई छल कपट था
जो भी थे हम सब एक जैसे थे
प्यार के बंधन में बंधे रहते थे
दिल के धागे कितने मजबूत थे।
ना जाने कैसे हवाएं यह चलने लगी, सब कुछ टूटते नजर आने लगे थे
जो रहते थे सब मिलकर एक साथ, वो सब एक दूसरे दूर होने लगे थे।
दिल के धागे कितने मजबूत थे
पर आज दिल के धागे टूट से गए थे।
पहले दिल के धागे मजबूत थे।
आज टूट से गए है दिल के धागे……..

राकेश मेनारिया

Ravi Kumar

मैं रवि कुमार गुरुग्राम हरियाणा का निवासी हूँ | मैं श्रंगार रस का कवि हूँ | मैं साहित्य लाइव में संपादक के रूप में कार्य कर रहा हूँ |

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