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दिवसनाथ आकांक्षा-अशोक-यदव

तुम चाँद कभी बन जाना,सूरज मैं भी बन जाउंगा।
तुम शीतलता बरसाना,मैं आग में जल जाऊँगा ।।

सज-धजके बैठे रहना तुम,करके अंग सोलह श्रृंगार।
दुल्हन बन मुस्कराना तुम,संग चलने को रहना तैयार।।

काली घटाओं का कुंतल,मांघमोती बनाना तारक को।
कपाल पटिया माणिक है,मुकुट बना स्वर्ण चमक को।।

नयन नील गगन की आभा, दंत रजत द्रव्य समान है।
युगल भ्रू मध्य नीलम बिंद,श्रुतिपट कर्णफूल हिमान है।।

नसिका शोभित लवंगफूल,रदनच्छद पुष्पासव की धारा।
प्रवाल हार सोहत गर्दन में, पाणि लिए बैठी पुंडरीकारा।।

वल्लरी कमर तारक दल, पैंजन पग गुल गुंचा कलधौत‌।
श्यामा के चीर कुसुमाकर, विभूषण मधुमाह रक्तमणौत।।

तुम स्निग्ध चाँदनी फैलाकर,जग को नवल प्रकाश करना।
मुझसे दिवस बिछड़कर तुम, कभी न नयन आहें भरना।।

दिन ढ़लते ही तुमसे मिलूंगा,तुम पथ में मेरा इंतजार करना।
मुख में आभा मुस्कान लेकर,तुम राह मेरा पल-पल तकना।।

झिलमिल चमकते तारों को, अपनी सखी तुम बना लेना।
सुहाग सेज की तरह जग को,तमाल प्रसुनों से सजा देना।।

जुगनुओं के दिव्य रोशनी को, अंबर में दीपक बना लेना।
गंधसार के खुशबुओं से तुम,तारापथ को आलोक करना।‌।

वादा है तुमसे मेरा वनिता, मैं जरूर मिलने शीघ्र आऊंगा।
गुलशन से गुल चुराकर के, वपु पर मैं तुम्हारे बरसाऊंगा।।

तुम चांद कभी बन जाना, सूरज मैं भी बन जाऊंगा।
तुम शीतलता बरसाना, मैं आग में जल जाऊंगा।।

कवि- अशोक कुमार यादव।

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