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डूबती सभ्यता-अभिषेक-पाठक

डूबती सभ्यता*
कट रहे वृक्ष पंक्षी किधर जाएंगे।
आसमां से जमी पर उतर जाएंगे।
अब अनारों से छिलके हटाओ नहीं,
दाने दाने निकल कर बिखर जाएंगे।
संस्कृति का हनन जो हुआ इस कदर,
तो हर तरफ बेबसी वाला घर पाएंगे।
पूर्वजों की निधि देख लूटते हुए,
स्वर्ग में संत अपने सिहर जाएंगे।
देखकर रीतियां नीतियां यह नई,
हर बुजुर्गों के आंसू उतर जाएंगे।
कट रहे वृक्ष……….
बहते बादल बुलाना जरूरी नहीं।
रूप सबको दिखाना जरूरी नहीं।
हुस्न का है किला नाम तेरे भले ,
इस किले को डहना जरूरी नहीं।
जो कहानी यहां जानकी जी रची,
यार उसको भूलना जरूरी नहीं।
तेरे पहनावे से कुछ ना परहेज है,
बस बदन को दिखाना जरूरी नहीं।
इस तरह आवरण को हटाओ नहीं।
है विपुल संपदा जो दिखाओ नहीं।
जो सदा से बना है नजर के लिए,
दीप है आचरण का बुझाओ नहीं।
भारतीय धर्म के योग्य जो है लिखा,
अब उसे आजकल में मिटाओ नहीं
नैन पर नींद का बोझ हलका रखो,
ख्वाब में भूलकर घर लुटाओ नहीं।
गर विषैली फिज़ा से ना दूरी हुई,
फिर कहीं पर नहीं हम बसर पाएंगे,
कट रहे वृक्ष पंक्षी…….

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