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फटी आंचल – नवीन कुमार

कोई तो रोक लो, मुसाफ़िर हूँ तेरा
बीते बचपन इधर ही कंही बिताये थे

पक्का मकान छोड़ आया हूँ, मिट्टी के मकान में रहने
याद आती है माँ, ढूंढ रहा हूँ, इधर ही रूठ कर गये थे

आज बहुत कमाये पैसे, खर्च कैसे करे
कल माँ की फटी मैली आंचल में सोये थे

दुनिया डराती है मुखौटे पहनकर
माँ शक्ल बनाती तो खिलखिलाकर हँसते थे

माँ ने हर बार पहचाना मुझको
जब भी मुख पर कालिख़ पोतकर गये

ख़बर पड़ोसी से माँ की पूछ लेते, मुझे बचपन में सब पहचानते थे
शक्ल क्या बदली, सब मुझे ही भूल गये

कोई तो रोक लो, मुसाफ़िर हूँ तेरा
बीते बचपन इधर ही कंही बिताये थे

Navin Kumarनवीन कुमार
मुंबई

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Ravi Kumar

Ravi Kumar

मैं रवि कुमार गुरुग्राम हरियाणा का निवासी हूँ | मैं श्रंगार रस का कवि हूँ | मैं साहित्य लाइव में संपादक के रूप में कार्य कर रहा हूँ |

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