गांव बंद- दीप जांगड़ा

गांव बंद- दीप जांगड़ा

दुनिया तै कमा कै खुवाण का धर्म निभाता देख्या सै
एक किसान अपणे हक़ ख़ातर धक्के खाता देख्या सै

आपणे ज़मीर पर कै लखाती भींता जिसा होगया
नींव मैं लागी होई बोदी पिल्ली ईंटां जिसा होगया
दुखां की चादर मैं सुख लपेट कै धरया करता
यू वोहे ज़मीदार सै जिसपै भगवान भी आस करया करता
बेटयाँ जुकर पाली फ़सल कै आग लगाता देख्या सै
एक किसान अपणे हक़ ख़ातर धक्के खाता देख्या सै

कदे बैंक कदे बाणीये बारी बारी सबनै लुटया सै
सब तरियां की बाह ली फ़ेर इब गुस्सा फुटया सै
सारे बदल बदल देखे सरकारी डमरू ना बाज्जे
सब किमैं लूट कै खागे दिखै फ़ेर भूखे सैं ना रज्जे
नूण धर कै बासी टिकडाँ का भोग लगाता देख्या सै
एक किसान अपणे हक़ ख़ातर धक्के खाता देख्या सै

तेहरवां रत्न होवै दूध उएँ गालां मैं खिंडाया ना जाता
हाड़ तोड़ कै खेती होंवै सै न्यू सब पै कमाया ना जाता
डांगर ढोर पशु पखेरू सारे घर के जियाँ बरगे मान्या करै
उएँ ना पनीर बणता गात नै सानी गेल्याँ हाली सान्या करै
दो दो रपियाँ के चैकाँ ऊपर खाते खुलवाता देख्या सै
एक किसान अपणे हक़ ख़ातर धक्के खाता देख्या सै

इब्बे सी तो घणा माड़ा टेम भी देख कै आया था
छोरी का ब्याह धर राख्या था अर रपिया टोहया ना पाया था
साहूकार भी आंख दिखा कै बोल्या करता
घर का समान भी गूँठा लुवा कै तोल्या करता
नोट बंदी की लाइनां मैं जी छोड़ कै जाता देख्या सै
एक किसान अपणे हक़ ख़ातर धक्के खाता देख्या सै

बिजली ना खाद ना दवाई लेण की औकात ना
पीसा ना धेला ना अर किसे अपणे तक का साथ ना
टोटा बैरी होरया घर का मरया भी क्यूकर जा सकै है
छोरा घाबरु बेरोजगार बेघर करया भी क्यूकर जा सकै है
रिश्वत देवण नै घर बार खेत की बोल्ली लुवाता देख्या सै
एक किसान अपणे हक़ ख़ातर धक्के खाता देख्या सै

बलधां मैं इब कित सत सै ट्रैक्टर बाहवण लाग गया
घी के बारे खावणिया सल्फॉस खावण लाग गया
क्यूकर पाटै करज़ा बैंक नै हाथ काट कै धर राखे
धरती के सब खसरा खेवट बैंक के सुपर्द कर राखे
रस्सी गल मैं घाल कमेरा कर्ज़ चुकाता देख्या सै
एक किसान अपणे हक़ ख़ातर धक्के खाता देख्या सै

धरती आला ढुंगा हो गया नीर नहर मैं आता ना
डीज़ल जा लिया अम्बरं मैं इब ज़मीदार नै थ्याता ना
बिजली की तै बूझो मत भूख भाज ज्या भा सुण कै
कुछ नेता लूट कै खागे रै कुछ साहूकार ला गया घुण कै
खड़ी फ़सल पै ऊपर आला कहर बरपाता देख्या सै
एक किसान अपणे हक़ ख़ातर धक्के खाता देख्या सै

गाम करे सैं बंद बंद यें खोलण ख़ातर आंख जगत की
ख़ून का पाणी कर लयाँ सां जब खाओ थम तीन बख़त की
भूखा सोज्या कुणबा मेरा मेरे के लेखां मैं न्या कोन्या
मेरी फ़सल चाहिए भा माटी के सरकारी चीज का भा कोन्या
“दीप” कलम तै धरती पूत की व्यथा सुणाता देख्या सै
एक किसान अपणे हक़ ख़ातर धक्के खाता देख्या सै

दुनिया तै कमा कै खुवाण का धर्म निभाता देख्या सै
एक किसान अपणे हक़ ख़ातर धक्के खाता देख्या सै

 

 

  दीप जांगड़ा

Deep Jangra

मैं दीप जांगरा कैथल हरियाणा का निवासी हुँ। मैं वीर रस का कवि हूँ।

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