गज़ल-जितेंद्र शिवहरे

गज़ल-जितेंद्र शिवहरे

जमाने को गुजरे एक जमाना हो गया
ये शादी का कुर्ता कितना पुराना हो गया

जिसे गुनगुना दिया करते थे हम युं ही
सुगम संगीत का सुमधुर तराना हो गया।

नाम न सुना था जिनका कानों ने कभी
शेरो-शायरी में वो नामी घराना हो गया।

टकराये थे मंदिर के सामने सड़क पे हम
तभी से मेरा मंदिर आना-जाना हो गया।

याद है वो इश़्क का पहला दिन आज भी
कहा था लोगों ने ये छोरा दिवाना हो गया।

ग़र इश़्क है तो इकरार कर ही दो आज
कहोगे मैं किसी शमा का परवाना होगया।

मेहमान घर पे है, मां आने नहीं दे रही
न आने का ये बहाना पुराना हो गया।

आदमखोर भी इंसान बन गए ‘जितेंद्र’
मोहब्बत का ये कैसा कारनामा हो गया।

 

जितेंद्र शिवहरे

चोरल ,महू, इन्दौर 

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