गीत-अनुश्री दुबे

गीत-अनुश्री दुबे

दोस्तों इस कलियुग हर व्यक्ति अपने बच्चों पर शक करता है मगर हर बच्चा शक के दाएरे में खड़ा करने के लिए नहीं होता।ज्यादातर शक मोबाइल की बजह से होता लेकिन क्या केवल मोबाइल की बजह से बच्चों पर शक किया जा सकता है।ये कहां तक सही है। हर बच्चा एक जैसा नहीं होता। इस गीत का उद्देश्य किसी को ठेस पहुंचाना नहीं है। इस गीत का उद्देश्य सारे माता पिता को यह बताना है कि जब एक सही बच्चे पर उसके माता पिता शक करते है तो हो सकता है कि वह यह सब सहन न कर पाये।इससे बच्चें के मन के साथ साथ दिमाग पर भी असर होता है।आशा करती हूं आप लोग मेरी बात को समझेंगे।

एक पिता अपनी लड़की से कह रहा है।ध्यान दीजिएगा।

लड़की देखो कैसी है ये ढीठ आवारा।
अब तो न रहा है इसपे विश्वास हमारा।
लड़की देखो कैसी है ये ढीठ आवारा।
साहित्य के परिवार को कहती है यह परिवार है हमारा।
जिससे बना लीं कुछ सेहलियां जिनको देखा न भारा।
तुझ जैसी तो कवियत्री सड़क पर मिल जातीं हैं।
एक कवि सम्मेलन करके ये कवियत्री बन आतीं हैं।
जरा इनको समझाओं कि इनकी इतनी औकात कहां है।
और लड़कियों में दिमाग है इसमें बात कहां है।
लड़की देखो कैसी है ये ढीठ आवारा।
अब तो न रहा है इसपे विश्वास हमारा।
लड़की देखो कैसी है ये ढीठ आवारा।

अब एक लड़की अपनी सफाई दे रही है।ध्यान दीजिएगा।

अरे मैं लड़की नहीं हूं ढीठ आवारा।
अपनी सोच से दिखाऊंगी एक नया नजारा।
अरे मैं लड़की नहीं हूं ढीठ आवारा।
क्यों शक के महल में आप खड़ा कर रहे हो।
क्या इसीलिए आप मुझे इतना बड़ा कर रहे हो।
सबाल पूछ लो उतने आपका शक जहां तक है।
इन सेहलियों ने ही पूछा जख्म कहां तक है।
बहुत छोटी हो आपसे मैं कुछ कह नहीं सकती।
मगर साहित्य के बिना मैं जिंदा रह नहीं सकती।
अरे मैं लड़की नहीं हूं ढीठ आवारा।
अपनी सोच से दिखाऊंगी एक नया नजारा।
अरे मैं लड़की नहीं हूं ढीठ आवारा।

 

         अनुश्री दुबे
      इटावा,उत्तर प्रदेश

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