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अधूरे सपन-शुभम-पांडे

ना तुम्हारा मिलन हमसे पूरा रहा
और हमारा मिलन भी अधूरा
काव्य के प्रेम का एक प्रणय है सदा
ना वो पूरा रहा ना अधूरा रहा
प्यार की वो अनोखी सुबह भी तो थी
जो निगाहों से आहो की गति जानती
बिन कहे बिन सुने जो समझ गए थे हम
प्यार की पूरी कहानी वह थी
इक नजर भी तो थी इक कसर भी तो थी
जो न पूरी दिखी जो न पूरी हुई
उन गुलाबों की पंखुड़ी मचल सी गई
जब भ्रमर की जगह वह भंवर में गई
आशिकी तो नहीं पर मोहब्बत तो थी
हर खुशी में तुम्हारी खुशी रह गई
इस प्रणय के पावन बंधन भी हैं
जो निभाने भी हैं जो बचाने भी है
ना तुम्हारा मिलन हमसे पूरा रहा
और हमारा मिलन भी अधूरा रहा

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