गिरतों को खड़ा करते है – जितेंद्र शिवहरे

गिरतों को खड़ा करते है – जितेंद्र शिवहरे

काली अंधेयारी रातों में चादर
मूंह तक ओढ़ लेता हूं
इस्तक़बाल जब गुनाह करे
इन्कार-ए-अदब से हाथ जोड़ लेता हूं।

चलो दिल को अपने बड़ा करते है

आओ मिलके गिरतों को खड़ा करते है।

समझे उन्हें जो हर बात पे अड़ा करते है

सूने उनकी भी जो बिना बात लड़ा करते है।

हौसलाअफजाई से मायुसों को खड़ा करते है

सीखें उनसे जो मंजिल दर मंजिल बढ़ा करते है।

चलना जाने उनसे जो सीधे पहाड़ चढ़ा करते है

हीरे , मोती , सितारें भी मुकद्दर में जढ़ा करते है।

झण्डे नामों के युं ही नहीं गढ़ा करते है

तख्त़ों ताज पे सितारें भी से मढ़ा करते है।

हस्ती क्या उसकी जो हर मौसम में झड़ा करते है?

मंजिल मिले उसी को, जो मन को अपने कढ़ा करते है।

जो बढ़ते नहीं ,रूके पानी की तरह सड़ा करते है

आओ सोच को अपनी ठण्डा घढ़ा करते है।

चलो दिल को अपने बड़ा करते है।

आओ मिलके गिरतों को खड़ा करते है।

—जितेंद्र शिवहरे
     इन्दौर

Ravi Kumar

मैं रवि कुमार गुरुग्राम हरियाणा का निवासी हूँ | मैं श्रंगार रस का कवि हूँ | मैं साहित्य लाइव में संपादक के रूप में कार्य कर रहा हूँ |

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comments
  • Jitendra Shivhare, thank you ever so for you post.Much thanks again.

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    नमस्कार जी!
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