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हमहू खड़े होई गैन परधानी मा-बलकावी-जय-जितेंद्र

जेहिका कोऊ पूँछत नहिन रहै गाँव मा।
वी खड़े हैं अबकी चुनाव मा।।

जऊँ कालतलक मुँह फुलाय घूमत रहै।
वी परे हैं कल्लू के पाँव मा।।
जेहिका पता नहिन केतनी क्षमता है अपने नाव मा।
वी खड़े हैं अबकी चुनाव मा।।

एतना देखतै मन हमारौ विचलित होई गवा।
कामधंधा छोड़ि के सब देशभक्ति का जुनून सवार होई गवा।।
जब लाख कोशिश के बावजूद नौकरी न मिली जवानी मा।
भरा फारम चट्टै हमहू खड़े होई गैन परधानी मा।

उम्मीदवार की हालत देख हमका रोना आ गवा।
यहि चुनाव का आलम बड़ा निराला होई गवा।।
कालतलक जेहिका गर्लफ्रैंड बतावत रहैं।
आज वहिका पति जीजा जी होई गवा।।

अब का लिखी मुर्गा दारू की कहानी मा।
जेवर-जट्टा खेती-बाड़ी सब बिकि गयै बिरियानी मा।।
याकौ वोट हम दयाखै ना पावा।
सब चली गयै कनिहानी मा।।

पहिले हमहू घूमित रहेन सूटबूट शेरवानी मा।
जबते हारेन है हम घूमि रहेन बनियानी मा।।
तबहिन ते हम उबरि न पावा झेलि रहेन परेशानी मा।
कान पकड़ि के कसम खाइत कबो न खड़े ह्वाब परधानी मा।।

 ~बालकवि जय जितेन्द्र
    रायबरेली (उत्तर प्रदेश)

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