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जननी का शत्रु-कंचन -कुमारी

तू ही है जो पर्वत पहाड़ों को फोड़ता ,
तू ही है जो नदियों में केमिकल को घोलता,
तू ही है जो धरती की शान को,बिखोरता,
पैरों कुल्हाड़ी मार, स्वार्थ पीछे दौड़ता,
कुछ दिन के प्राण…
कुछ दिन के प्राण तेरे फिर भी अभिमान,
तेरे मन पर क्यु छाया अंधकार है रे ,

जननी का शत्रु बन गया तू रे…
हां जननी का शत्रू बन गया क्यु रे…

जन्नत सी मांँ को तूने जहन्नुम बना दिया,
जननी सी माँ को तूने कैसे बिगाड़ दिया,
पालन भगवान को तूने क्या है सम्मान दिया,
लोगों के हित का कोई ऐसा ना काम किया, फिर भी क्यों तुझे अभिमान है रे…..

जननी का शत्रु बन गया तु रे…
हां जननी का शत्रु बन गया क्यो रे…

धन ना होने पर तूने चोरी का काम किया,
ईर्ष्या होने पर तूने पाप अंजाम दिया,
बेटे की चाह,भ्रूण हत्या सा पाप किया,
काम इच्छा हेतु तूने अपहरण सा काम किया,
दानव से निम्न तू चला गया है रे…
कलयुग का दास बन गया है रे..

जननी का शत्रु बन गया है रे…
हां जननी का शत्रु बन गया है रे…

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