जारी थी मेरी जगं – दिव्यानि पाठक

जारी थी मेरी जगं – दिव्यानि पाठक

सोई हुई मेरी कलम थी ।
उसमें जागी उमंग नई थी ।
अमानवीयता से छीड़ी मेरी जंग थी ।
उसमें भी अड़चने कई थी ।
झोको से डूबती उभरती नाव थी ।
दुराचार व्यवहार की भी क्या बात थी।
मानव के लिहाज मै शीयार की रूह थी।
नियति देखती मेरा मुह थी ।
हार मानी नहीं क्योंकि जंग थी ।
मेरी भी आत्मशक्ति पृबल थी ।
उनकी देह के कण कण मै,
दूरगुणो की गंध थी ।
थम गई वो जंग एक दिन ,
क्योकि दिव्य सोच मै दम थी ।
सोई हुई मेरी कलम थी ।
उसमे जागी उमंग नई थी ।

दिव्यानि पाठक
सीहोर, मध्य प्रदेश

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