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जीवन की सचाई-ओंकार-चौहान

(1)सोचता हूँ कुछ लिखूँ जीवन के इस अंन्त में ।
आरम्भ से कुछ लिखूँ जीवन के इस अंन्त में ।
समझ न पाया समय का खेल, भूल गया जीवन का मेल।
सोचा था मैने क्या मिल जाऐगा जीवन का मेल।
सोचा था ना मैने आऐंगा, कोई जीवन में ऐसा मेल।
सोचता हूँ कुछ लिखूँ जीवन के इस अंन्त में

(2) समय भी ऐसा आता है, कैसा खेल दिखता है ।
जीवन के हर एक सुख सुविधा को, छड़ भर में मिटता है
पूरा जीवन मैं घुमा इधर उधर की गलियारों में ।
जीवन के हर एक पहलू को, भूल गया छड़ भर में ।
झूठी आन शान के लिए जिया मैने पूरा जीवन
संघर्ष के मीठे जल को ना पीया मैने पूरा जीवन ।
सोचता हूँ कुछ लिखूँ जीवन के इस अंन्त में

(3) मगन हुवा करता था, हँसी के हर एक बातों से
समझ ना पाया मैं कभी, दुःख के हर एक बदल को ।
नदियों सा मैं बहता रहा, ठहरा ना मैं कहीं एक जगह ।
सदा सरल राह पर चला, कठिनाईयों का मुझे पता नहीं ।
जब काल का चक्र चलता है, अंत भयंकर रहता है ।
सोचता हूँ कुछ लिखूँ जीवन के इस अंन्त में

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