जुगनु सा चमके जाता हूँ! – राजपुत कमलेश ” कमल “

जुगनु सा चमके जाता हूँ! – राजपुत कमलेश ” कमल “

मावस की काली रातो में,
जुगनु सा चमके जाता हूँ!
हर अनुभव की मोती माला,
मै हाथ पिरोये जाता हूँ!!
प्रेम भरा विष का प्याला,
मै उसे घोल पी जाता हूँ!!!
मावस की काली रातो में,
मै जुगनु सा चमके जाता हूँ!
विडम्बना के अम्बर पर,
मै पन्छी बन उड जाता हूँ!!
ऑर छीन रोशनी सुरज से,
जग को प्रकाश दे जाता हूँ!!!
मावस की काली रातो में,
जुगनु सा चमके जाता हूँ!
है अन्धीयारा जो दीप तले,
मै उन्हें प्रकाशित करता हूँ!!
जो खयालात इस जहन में है,
मै शब्द उन्हें दे जाता हूँ!!!
मावास की काली रातो में,
जुगनु सा चमके जाता हूँ!
वसुधा का आन्चल थामे मै,
उपवन मान बढाता हूँ!!
खिल करके कीचड में भी,
मै कमल पुष्प कहलाता हूँ!!!
मावास की काली रातो में,
जुगनु सा चमके जाता हूँ!

Kamlesh Rajput(Kamal)राजपुत कमलेश ” कमल “
अहमदाबाद (गुजरात)

Ravi Kumar

मैं रवि कुमार गुरुग्राम हरियाणा का निवासी हूँ | मैं श्रंगार रस का कवि हूँ | मैं साहित्य लाइव में संपादक के रूप में कार्य कर रहा हूँ |

Visit My Website
View All Articles

I agree to Privacy Policy of Sahity Live & Request to add my profile on Sahity Live.

0

Leave a Reply

Create Account



Log In Your Account



×
नमस्कार जी!
बताइए हम आपकी क्या मदद कर सकते हैं...