कलम भी रो पड़ी-पूनम शर्मा

कलम भी रो पड़ी-पूनम शर्मा

आज मैंने कलम उठाई,
इक कविता लिखने को।
जैसे ही लिखा भूर्ण हत्या,
मेरी कलम भी रो पड़ी।।
मैंने पूछा क्या हुआ तुझको,
बोली कि बस अब और नहीं।
रख दो मुझको बन्द करके,
किसी भी कोने में कहीं।।
मैंने पूछा बात है क्या,
एक बार तो बोल तू।
बोली कितना लिखूं मैं इस पर,
होता तो कुछ है नहीं।।
मारी जाती हैं लड़कियां,
मां के गर्भ में आज भी।
बेटे की है चाह सभी को,
बोझ लगती बेटी ही।।
लिखने में ही इस विषय पर,
दर्द होता है मुझे।
उस नन्ही की पीड़ा को तो,
सोच भी हम सकते नहीं।।
दूसरों की कन्या को तो,
देवी सम हैं पूजते।
लेकिन अपने घर में,
बेटी मांगता कोई नहीं।।
लिखकर भी तुम क्या करोगे,
वक्त अपना बरबाद मत करो।
जान कर अन्जान है सब,
सोच बदलना चाहते नहीं।।

 

                   पूनम शर्मा

                  चंद्रवाल, दिल्ली

 

 

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