कर्म-राकेश कुमार मस्ताना

कर्म-राकेश कुमार मस्ताना

 पत्ता भी हिलता है तो उसी के हुक्म से ,
अधिकार है हमारा खुद ही के कर्म से मिलता है
जो पहले तेरी ही कर्म की नीयत से ,
चाँद तारे भी तू  ही उगा रहा है जिस से रोशन है
ये जहन हमारा , होता सब कुछ तेरी ही रहमों कर्म से ,
है सत्तापत्ति एक ही जो पूरा ब्रह्मांड चला रहा है,
सिर्फ तेरा ही घर नही वो तो जीव जन्तु सब को चला रहा है,
देता है वो जिसे भी सत्ता मिलती सत्ता उसे उसी के हुक्म से रखना याद इतना है
ये सत्ता उसी की, तू भी जीता हैं उसी के  राज से ,
दुरूपयुगे होता जब भी सत्ता का गिरता फिर वापिस तू उसी के हुक्म से,
संत की तपस्या भंग हो तो वो राजा हो जाता है ,पर जब भी राजा की तपस्या भंग हो  पुनः लोटा नरक अपने ही कर्म से,
 पत्ता भी हिलता है तो उसी के हुक्म से अधिकार है हमारा खुद के  ही कर्म से,
 Rakesh Kumar Mastana  
राकेश कुमार मस्ताना

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