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काश! लौट आता वो दिन-खुशबू-साह

काश! लौट आता वो दिन,
क्या दिन थे हंसी रुकती नहीं थी,
और अभी आंसू थमते नहीं।
तभी खुशियों की थी बौछार,
और अभी गम की है बरसात।
काश! कि वो पल आ जाए,
जिसमें सबका साथ हो, सबकी खुशी हो,
न हो गम का अंश।
काश! कि लोग समझते एक-दूसरे को,
सबकी करते परवाह।
क्यों? आखिर क्यों?
मतलबी हो गए हैं, आजकल सब,
क्यों नहीं समझते तकलीफ,
कि कैसे? सह पायेगी ये दर्द।
क्यों? उसे छोड़ अपनी देखते हैं सब,
काश! सबकुछ पहले जैसा हो जाता।
काश! लौट आता वो दिन।।

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