कश्मीर का सच-शिवकुमार व्यास

कश्मीर का सच-शिवकुमार व्यास

हृदयस्थल है भारत का जो स्वर्ग धरा का कहलाता।
जिस माटी से ऋषि मुनियों का भी पावनतम है नाता।
जिस धरती की केसर पूरी दुनिया को खुशबू देती।
और जहाँ पर होती है सर्वोतम फूलों की खेती।
अमरनाथ की पावन नगरी और वैष्णो की घाटी।
सूरज की किरणो का आंगन और शहादत की माटी।
जो बलिदानों से निर्मित है और जिसकी निर्मल काया है।
जिस पर हँसकर हेमराज ने अपना शीश चढाया है।
सर्व धर्म समभाव जहाँ की रही सदा ही परिपाटी।..
लेकिन उसे मिटाने पर खुद तुली हुयी केशर घाटी।
तो रूठा झेलम का पानी डल का पानी शर्मिदा है।
अरे मोहव्वत की वादी में उग्रवाद क्यों जिन्दा है।
2
सदियों से जो पूज्य रही उस माटी का अपमान किया।
खूनी संघर्षो से उसके दामन को बदनाम किया।
कितने घर बरबाद किये और कितनी माँग उजाडी है।
नन्दन वन की छाती में डायना माईटें गाडी हैं।
तव प्रकृति हुई विकराल धैर्य की खाई उसकी टूट गयी।
अड़तालीस घटे में ही जीने की आशा छूट गयी।
हिम खण्डों के नयनों की धारा में घाटी डूब गयी।
अौर चिनार बन गया सिन्धु केशर की माटी डूब गयी।
कुदरत का यह कहर इसे तुम सिर्फ नियत न मानो जी।
प्रकृति इशारा समझ सको तो अब इसको पहचानो जी।
3
क्यों कि जब जब इस धरती पर पाप बहुत बढ् जाता है।
और सज्जनों के मन का संताप बहुत बढ जाता है।
तब तब प्रकृति पुरुष दोनों अवतार धार कर आते हैं।
पापी अन्यायी से इस पृथ्वी को मुक्त कराते हैं।
वही प्रकृति नाराज हुयी शिव का सिंहासन डोला है।
और वैश्णो देवी ने अपने त्रिशूल को तोला है।
कटा शीष भैरव बाबा का हर हर बम बम बोला है।
अमर नाथ से शिवशंकर ने नेत्र तीसरा खोला है।
रूद्र हुये जब रौद्र तभी बरसात मूसला धार हुयी।
शिव ने झटके केश कुपित तब गंगा माँ की धार हुयी।
4

जो जिहाद के नाम पे भोली जनता को बहकाते थे।
और अलगाव वाद के नारे खुले आम लगवाते थे।
जो सेना के नेक काम में भी रोडे़ अटकाते थे।
सूरज को जुगनू कहते जुगनू को चाँद बताते थे।
वे धर्म के पीछे छिपे हुये चेहरे शैतानी कहाँ गये।
पूरा भारत पूँछ रहा है मलिक गिलानी कहाँ गये।
कहाँ गये घुसपैठी जिनको रिस्ते दार बताते थे।
जिन्हें सुरक्षा देते थे और बिरयानी खिलवाते थे।
फहराते थे जिनका झंण्डा तुम वह काका कहाँ गये।
जिनका जिन्दा बाद बोलते थे वे आका कहाँ गये।

याद रखो तुम जीवन में जब कठिन समयआ जायेगा।
सिर्फ तुम्हारा भाई ही तुमको बढकर अपनायेगा।
देखो तुमने पत्थर से जिनपर हमले करवाये हैं।
वे जान हथेली पर लेकरके तुम्हे बचाने आये है।
लाल चौक पर जिनके पुतले फूँके झंण्डे फाडे हैं।
दिन में पाँच बार गाली देकरके जिन्हों लताडे है।
वही तुम्हारे लिए मदद में सेना से भी बोल दिए।
और तिजोरी के भी सारे बन्धन तुम पर खोल दिये
जिनको भाई समझ रहे हो भाई नही कसाई हैं।
और तुम्हे जो बचा रहें है वही तुम्हारे भाई हैं।

 

शिवकुमार व्यास
   बाराबंकी, उत्तर, परदेश

0

Leave a Reply

Create Account



Log In Your Account