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खाली बर्तन-साथी-टी

पहनती मुखौटा मैं
अब तो फेंकने में
अशक्त हूं।
पहचान करने के मैं
अपने को, यत्न में
निराश हुईं।
मां को पुकारती हैं
रोती दुनिया में
खोजती रही ।
चाहती प्रकाश मैं
आसपास अंधेरे में
मंत्र जपती रही,
शापवचनसुन मैं
मंत्र गलती के
क्याजपती?
गहराई में पालित मैं
वही सुन्दरादर्श में
सांत्वना मिली
अब फुर्सत नहीं रोने को ,ज़िन्दगी फूली-फली,
आंसू में विलीन स्मित-कण गगन में उडाये,
स्मृति मां की अलौकिक रूप से विह्वल उठी,
अब बर्तन खाली नहीं।

-डॉ सती गोपालकृष्णन

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