ख़्वाब की बातें-परवेज़ हुसैन

ख़्वाब की बातें-परवेज़ हुसैन

तेरे होंठों को अब मैं गुलाब कर दूँ !
आ तुझे पी कर मैं अब शराब कर दूँ !!

ज़रा इतमीनान रख़ बातों पर मेरी !
वक़्त आने भी दे, सारा हिसाब कर दूँ !!

तू सोचना तो कभी मुझे यादों में !
नींद को तेरी मैं सुहाने ख़्वाब कर दूँ !!

वो मुज़रिम है जो बैठा है छुपकर !
सोचता हूँ उसे अब बे-नकाब कर दूँ !!

उसने दाग़ा है सवाल मेरे दामन पर !
उसकी बज़्म में उसे ला-जवाब कर दूँ !!

उसने उठाई है जो मुझ पर उँगली !
देख लेना उसका खाना-ख़राब कर दूँ !!

क्यों ज़िश्म की नुमाईश कर रहे हो !
सीने से लगा के बाहों का लिबास कर दूँ !!

कहीं दूर वो बैठे हैं मज़मा लगा कर !
उनको तितर-बितर जा कर जनाब कर दूँ !!

सजी बैठी है दुल्हन मेरी नर्म बिस्तर पे !
चाहता हूँ मैं भी इक प्यारा सा अज़ाब कर दूँ !!

अँधेरे में वो बैठी है मुहब्बत मेरी परवेज़ !
जला के दिल अपना मैं रौशन चराग़ कर दूँ !!तेरे होंठों को अब मैं गुलाब कर दूँ !
आ तुझे पी कर मैं अब शराब कर दूँ !!

ज़रा इतमीनान रख़ बातों पर मेरी !
वक़्त आने भी दे, सारा हिसाब कर दूँ !!

तू सोचना तो कभी मुझे यादों में !
नींद को तेरी मैं सुहाने ख़्वाब कर दूँ !!

वो मुज़रिम है जो बैठा है छुपकर !
सोचता हूँ उसे अब बे-नकाब कर दूँ !!

उसने दाग़ा है सवाल मेरे दामन पर !
उसकी बज़्म में उसे ला-जवाब कर दूँ !!

उसने उठाई है जो मुझ पर उँगली !
देख लेना उसका खाना-ख़राब कर दूँ !!

क्यों ज़िश्म की नुमाईश कर रहे हो !
सीने से लगा के बाहों का लिबास कर दूँ !!

कहीं दूर वो बैठे हैं मज़मा लगा कर !
उनको तितर-बितर जा कर जनाब कर दूँ !!

सजी बैठी है दुल्हन मेरी नर्म बिस्तर पे !
चाहता हूँ मैं भी इक प्यारा सा अज़ाब कर दूँ !!

अँधेरे में वो बैठी है मुहब्बत मेरी परवेज़ !
जला के दिल अपना मैं रौशन चराग़ कर दूँ !!
तेरे होंठों को अब मैं गुलाब कर दूँ !
आ तुझे पी कर मैं अब शराब कर दूँ !!

ज़रा इतमीनान रख़ बातों पर मेरी !
वक़्त आने भी दे, सारा हिसाब कर दूँ !!

तू सोचना तो कभी मुझे यादों में !
नींद को तेरी मैं सुहाने ख़्वाब कर दूँ !!

वो मुज़रिम है जो बैठा है छुपकर !
सोचता हूँ उसे अब बे-नकाब कर दूँ !!

उसने दाग़ा है सवाल मेरे दामन पर !
उसकी बज़्म में उसे ला-जवाब कर दूँ !!

उसने उठाई है जो मुझ पर उँगली !
देख लेना उसका खाना-ख़राब कर दूँ !!

क्यों ज़िश्म की नुमाईश कर रहे हो !
सीने से लगा के बाहों का लिबास कर दूँ !!

कहीं दूर वो बैठे हैं मज़मा लगा कर !
उनको तितर-बितर जा कर जनाब कर दूँ !!

सजी बैठी है दुल्हन मेरी नर्म बिस्तर पे !
चाहता हूँ मैं भी इक प्यारा सा अज़ाब कर दूँ !!

अँधेरे में वो बैठी है मुहब्बत मेरी परवेज़ !
जला के दिल अपना मैं रौशन चराग़ कर दूँ !!
तेरे होंठों को अब मैं गुलाब कर दूँ !
आ तुझे पी कर मैं अब शराब कर दूँ !!

ज़रा इतमीनान रख़ बातों पर मेरी !
वक़्त आने भी दे, सारा हिसाब कर दूँ !!

तू सोचना तो कभी मुझे यादों में !
नींद को तेरी मैं सुहाने ख़्वाब कर दूँ !!

वो मुज़रिम है जो बैठा है छुपकर !
सोचता हूँ उसे अब बे-नकाब कर दूँ !!

उसने दाग़ा है सवाल मेरे दामन पर !
उसकी बज़्म में उसे ला-जवाब कर दूँ !!

उसने उठाई है जो मुझ पर उँगली !
देख लेना उसका खाना-ख़राब कर दूँ !!

क्यों ज़िश्म की नुमाईश कर रहे हो !
सीने से लगा के बाहों का लिबास कर दूँ !!

कहीं दूर वो बैठे हैं मज़मा लगा कर !
उनको तितर-बितर जा कर जनाब कर दूँ !!

सजी बैठी है दुल्हन मेरी नर्म बिस्तर पे !
चाहता हूँ मैं भी इक प्यारा सा अज़ाब कर दूँ !!

अँधेरे में वो बैठी है मुहब्बत मेरी परवेज़ !
जला के दिल अपना मैं रौशन चराग़ कर दूँ !!
तेरे होंठों को अब मैं गुलाब कर दूँ !
आ तुझे पी कर मैं अब शराब कर दूँ !!

ज़रा इतमीनान रख़ बातों पर मेरी !
वक़्त आने भी दे, सारा हिसाब कर दूँ !!

तू सोचना तो कभी मुझे यादों में !
नींद को तेरी मैं सुहाने ख़्वाब कर दूँ !!

वो मुज़रिम है जो बैठा है छुपकर !
सोचता हूँ उसे अब बे-नकाब कर दूँ !!

उसने दाग़ा है सवाल मेरे दामन पर !
उसकी बज़्म में उसे ला-जवाब कर दूँ !!

उसने उठाई है जो मुझ पर उँगली !
देख लेना उसका खाना-ख़राब कर दूँ !!

क्यों ज़िश्म की नुमाईश कर रहे हो !
सीने से लगा के बाहों का लिबास कर दूँ !!

कहीं दूर वो बैठे हैं मज़मा लगा कर !
उनको तितर-बितर जा कर जनाब कर दूँ !!

सजी बैठी है दुल्हन मेरी नर्म बिस्तर पे !
चाहता हूँ मैं भी इक प्यारा सा अज़ाब कर दूँ !!

अँधेरे में वो बैठी है मुहब्बत मेरी परवेज़ !
जला के दिल अपना मैं रौशन चराग़ कर दूँ !!
तेरे होंठों को अब मैं गुलाब कर दूँ !
आ तुझे पी कर मैं अब शराब कर दूँ !!

ज़रा इतमीनान रख़ बातों पर मेरी !
वक़्त आने भी दे, सारा हिसाब कर दूँ !!

तू सोचना तो कभी मुझे यादों में !
नींद को तेरी मैं सुहाने ख़्वाब कर दूँ !!

वो मुज़रिम है जो बैठा है छुपकर !
सोचता हूँ उसे अब बे-नकाब कर दूँ !!

उसने दाग़ा है सवाल मेरे दामन पर !
उसकी बज़्म में उसे ला-जवाब कर दूँ !!

उसने उठाई है जो मुझ पर उँगली !
देख लेना उसका खाना-ख़राब कर दूँ !!

क्यों ज़िश्म की नुमाईश कर रहे हो !
सीने से लगा के बाहों का लिबास कर दूँ !!

कहीं दूर वो बैठे हैं मज़मा लगा कर !
उनको तितर-बितर जा कर जनाब कर दूँ !!

सजी बैठी है दुल्हन मेरी नर्म बिस्तर पे !
चाहता हूँ मैं भी इक प्यारा सा अज़ाब कर दूँ !!

अँधेरे में वो बैठी है मुहब्बत मेरी परवेज़ !
जला के दिल अपना मैं रौशन चराग़ कर दूँ !!
तेरे होंठों को अब मैं गुलाब कर दूँ !
आ तुझे पी कर मैं अब शराब कर दूँ !!

ज़रा इतमीनान रख़ बातों पर मेरी !
वक़्त आने भी दे, सारा हिसाब कर दूँ !!

तू सोचना तो कभी मुझे यादों में !
नींद को तेरी मैं सुहाने ख़्वाब कर दूँ !!

वो मुज़रिम है जो बैठा है छुपकर !
सोचता हूँ उसे अब बे-नकाब कर दूँ !!

उसने दाग़ा है सवाल मेरे दामन पर !
उसकी बज़्म में उसे ला-जवाब कर दूँ !!

उसने उठाई है जो मुझ पर उँगली !
देख लेना उसका खाना-ख़राब कर दूँ !!

क्यों ज़िश्म की नुमाईश कर रहे हो !
सीने से लगा के बाहों का लिबास कर दूँ !!

कहीं दूर वो बैठे हैं मज़मा लगा कर !
उनको तितर-बितर जा कर जनाब कर दूँ !!

सजी बैठी है दुल्हन मेरी नर्म बिस्तर पे !
चाहता हूँ मैं भी इक प्यारा सा अज़ाब कर दूँ !!

अँधेरे में वो बैठी है मुहब्बत मेरी परवेज़ !
जला के दिल अपना मैं रौशन चराग़ कर दूँ !!
तेरे होंठों को अब मैं गुलाब कर दूँ !
आ तुझे पी कर मैं अब शराब कर दूँ !!

ज़रा इतमीनान रख़ बातों पर मेरी !
वक़्त आने भी दे, सारा हिसाब कर दूँ !!

तू सोचना तो कभी मुझे यादों में !
नींद को तेरी मैं सुहाने ख़्वाब कर दूँ !!

वो मुज़रिम है जो बैठा है छुपकर !
सोचता हूँ उसे अब बे-नकाब कर दूँ !!

उसने दाग़ा है सवाल मेरे दामन पर !
उसकी बज़्म में उसे ला-जवाब कर दूँ !!

उसने उठाई है जो मुझ पर उँगली !
देख लेना उसका खाना-ख़राब कर दूँ !!

क्यों ज़िश्म की नुमाईश कर रहे हो !
सीने से लगा के बाहों का लिबास कर दूँ !!

कहीं दूर वो बैठे हैं मज़मा लगा कर !
उनको तितर-बितर जा कर जनाब कर दूँ !!

सजी बैठी है दुल्हन मेरी नर्म बिस्तर पे !
चाहता हूँ मैं भी इक प्यारा सा अज़ाब कर दूँ !!

अँधेरे में वो बैठी है मुहब्बत मेरी परवेज़ !
जला के दिल अपना मैं रौशन चराग़ कर दूँ !!तेरे होंठों को अब मैं गुलाब कर दूँ !
आ तुझे पी कर मैं अब शराब कर दूँ !!

ज़रा इतमीनान रख़ बातों पर मेरी !
वक़्त आने भी दे, सारा हिसाब कर दूँ !!

तू सोचना तो कभी मुझे यादों में !
नींद को तेरी मैं सुहाने ख़्वाब कर दूँ !!

वो मुज़रिम है जो बैठा है छुपकर !
सोचता हूँ उसे अब बे-नकाब कर दूँ !!

उसने दाग़ा है सवाल मेरे दामन पर !
उसकी बज़्म में उसे ला-जवाब कर दूँ !!

उसने उठाई है जो मुझ पर उँगली !
देख लेना उसका खाना-ख़राब कर दूँ !!

क्यों ज़िश्म की नुमाईश कर रहे हो !
सीने से लगा के बाहों का लिबास कर दूँ !!

कहीं दूर वो बैठे हैं मज़मा लगा कर !
उनको तितर-बितर जा कर जनाब कर दूँ !!

सजी बैठी है दुल्हन मेरी नर्म बिस्तर पे !
चाहता हूँ मैं भी इक प्यारा सा अज़ाब कर दूँ !!

अँधेरे में वो बैठी है मुहब्बत मेरी परवेज़ !

जला के दिल अपना मैं रौशन चराग़ कर दूँ !

 

                   परवेज़ हुसैन

               पौड़ी गढ़वाल ,उत्तराखंड

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