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किसान पर कविता-अनुष्का-पटेल

                     किसान

जब भोर में उसकी आंख खुले
तो हल लेके किसान चले
सूरज की किरणों से पहले
खेतों में किसान मिले।
देखे जब भी फसल को अपने
उसकी आँखों मे चमकार दिखे
मेहनत उसकी रंग लाए तब
मूछों पे उसके ताव दिखे। धूप तपाए तो सह लेता
ठंड कंपाए तो रह लेता
अपने इन कुर्बानी पे क्या
इतना ना अभिमान करें।
सोना चांदी तब काम न आवे
जब भूखा इंसान हो
अन्न से अपना भूख मिटा कर
तब सोता वो इंसान है।
फसल जो उसका बिगड़ गया तो
रोता वो किसान है
रात को आंखों में बेचैनी
लेकर सोता वो किसान है।
कभी भूख मिटे कभी ना मिटे
फिर भी मेहनत वो करता है
उसकी मेहनत का उसे फल मिले
बस यही चाहता वो किसान है।
खेती ही उसका जीवन है
और खेती ही सम्मान है
जो लेवे उसका जीवन(खेती) तो
वो देता अपना बलिदान है।

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