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किसान-ऑफ-द नेचर

मेरे सपनो को आशाओ के साथ बोता हूँ
तकलीफ़ों में भी रात को न सोता हूँ
सोचता हूँ इस बार कुछ अच्छा होगा
लेकिन जब खराब हो जाती हैं
मेरी उम्मीद की फ़सल
फ़िर भी मैं इसे रोता हुआ समेट लेता हूँ।
सोचता हूँ कुछ तो खिलेगी मुस्कान
नन्हें चेहरो पर
जब बेच इसे मैं घर को आता हूँ ।।
दूर किसी कौने में सिसकियाँ सुनाई देती हैं
मेरी लाचारी की
जब मैं अपनी ही कमाई का
उचित दाम न ले पाता हूँ।।।
यही मेरी हकीकत हैं की मेरा कुछ नहीं यहाँ
खून पसीना भी मैं ओरो पर
न्योछावर कर जाता हूँ
किसान जो हूँ देश का भार अपने कंधे ढोता हूँ।।।।

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