किया लिखूं-फरहाना गौहर

किया लिखूं-फरहाना गौहर

लिखना बहुत है मुझ को में किस बात पर लिखूं
बिगड़े हुए इस दौर के हालत पर लिखूं
बैठी है अपने दुवारे पे वो मुंह उतार के
औरत के रंज गम पे या जज़्बात पर लिखूं
बूढ़ी जो हो रही है बहुत सी कांवरियां
किया ऐसी लड़किओं के खयालात पर लिखूं
बीटा चला गया है जो एक माँ को छोड़ कर
माँ के तड़पते आंसूं की मंझधार पर लिखूं
कैसे गुज़ारते हैं वो लोग अपनी ज़िन्दगी
ऐसे गरीब बेकस व लाचार पर लिखूं
बेराह रवि में बहे गए कुछ ऐसे नवजवान
इस नेट के फायदे या नुक़सानात परलिखूं
मर्दो की बेवफाई तो एक आम बात है
कुछ बिगड़ी औरतो की खुराफात पर लिखूं
चारों तरफ है मसलों का ढेर इस कदर
किस किस को देखूं और में किस किस पे किया लिखूं
डूबी हूँ गहरी सोच के दरया में यूँ फरहा
कांटे लिखूं के फूल बताओ में किया लिखूं .

 

 

     फरहाना गौहर

मालेगाव,नासिक,महाराष्ट्र

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