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क्यूँ अपनी जिंदगी तबाह कर रहे हो-बलकावी-जय-जितेंद्र

क्यूँ अपनी जिंदगी तबाह कर रहे हो,
उसको कुछ नहीं फर्क पड़ेगा…
जिसके लिए तुम पल-पल मर रहे हो।

अरे यह हुस्न वाले हैं…..
इनके तो हर मोड़ पर यार मिलेंगे,
यह तो वह फूल है…..
जो पतझड़ में भी खिलेंगे।

इनको तो दिलों के साथ खेलने में मजा आता है,
मरना तुमको ही पड़ेगा इनका कुछ नहीं जाता है।

कल तुम मर रहे थे…
आज हम मर रहे हैं…
कल कोई और मरेगा,
इनके तो इश्क के खुले दरवाजे हैं….
कल कोई और प्रवेश करेगा।

तुम तो दिए हो…..
बिना तेल के क्यूं जल रहे हो,
अपने आप को पत्थर दिल बनाओ…
मोम की तरह क्यों पिघल रहे हो।

उसको तो खेलना था….
वह खेल के आज नहीं तो कल जाएगी,
अपनी आग को जिंदा रखो यारों…
सौ बातियां मिल जाएंगी।

तुम दिया और बाती बनकर….
जिंदगी संवार लेना,
गुजरे हुए पल को…..
अतीत समझकर बिसार देना।

तुम्हें तो अभी घर में रोशनी करना है,
मां बापू के सपनों को साकार करना है।

वो रुखसत हो गई तो क्या हुआ..
हमें उसको भी तो बताना है,
हम तेरे बगैर भी जी सकते हैं…
ये भी तो दिखाना है।

       ~बालकवि जय जितेन्द्र
          रायबरेली (उत्तर प्रदेश)

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