लेचल मुझे वहाँ पर साथी-अशोकदीप

लेचल मुझे वहाँ पर साथी-अशोकदीप

उगे जहाँ बिरवा ममता का
फसल नेह की लहलहाती ।
लेचल मुझे वहाँ पर साथी
प्रीत पले जहाँ दिन राती ।।

जहाँ बाल-अरुण की लालिमा
गागर रिश्तों की भरती हो
दुधमुँहे बच्चों- सी किरणें
अभिषेक हँसी का करती हों

रोते शिशुओं-से सपनों को
अपनायत दूध पिलाती हो
थपकी देकर धीरे-धीरे
अश्कों को प्रीत सुलाती हो

सूखता हो कटुता का सिंधु
नदिया प्रेम की गहराती ।
लेचल मुझे वहाँ पर साथी
प्रीत पले जहाँ दिन राती ।।

घाव किसी को ना देने की
जहां शपथ छुरी उठाती हो
औरों के काटे तन पर भी
घिस चंदन लेप लगाती हो

रोशन मिट्टी के दीयों पर
जहाँ आंधी दया बरसाए
राहों से भटके पथिकों को
रस्ता मंजिल का बतलाए

पकड़ कलाई जलती लौ की
पार कराए विषम घाटी ।
लेचल मुझे वहाँ पर साथी
प्रीत पले जहाँ दिन राती ।।

ऊँच-नीच की दीवार जहाँ
बालू भींत-सी ढह गई हो
रह गई हो प्रीत की थूनी
छानी जात की बह गई हो

गुलदस्ते के फूलों जैसे
लोग रचें जहाँ नव संसार
तज कर अपनी आपाधापी
करते हों जहाँ पर उपकार

उसी गाँव के वाशिंदों में
अब उम्र यार कटे बाकी ।
लेचल मुझे वहां पर साथी
प्रीत पले जहाँ दिन राती।।

 

अशोकदीप
जयपुर,राजस्थान

0

Leave a Reply

Create Account



Log In Your Account