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लेखनी से प्रेम-मुफ्त शिक्षा-पी के

लगी चिंता यह लेखनी
कहीं किस्मत को ही न लिख डाले
सोचा है मैंने जो
उस सोच को न जला  डाले
कहीं मेरी किस्मत मुझे लेखक ना बना डाले
न करता था यकीन किस्मत पर
मैं करता था भरोसा अपनी मेहनत पर
मेहनत को यह ना दहन कर डालें
कहीं मेरी किस्मत मुझे लेखक ना बना डाले
लगी लगन मेरी जब से
क्या प्रेम हुआ है मुझको इससे
इस प्रेम में ना मुझको डूबा डालें
कहीं मेरी किस्मत मुझे लेखक ना बना डाले
आती है  लिखने की याद रातों में लिखने बैठ जाता हूं
उठाकर घिटनिया दीपक जला देता हूं
आकर किसी दिशा से कोई पवन इस दीपक को बुझा डालें
कहीं मेरी किस्मत मुझे लेखक ना बना डाले
बनाया था और लक्ष्य मैंने
भुला दिया उस लक्ष्य को तूने
था भय उस लक्ष्य को भी ना जला डाले
कहीं मेरी किस्मत मुझे लेखक ना बना डाले
चलती है रातों में उठ उठ कर मेरे साथ
करती है मुझसे अकेले में भी बात
उन बातों को ना रातों में सजा डालें
कहीं मेरी किस्मत मुझे लेखक ना बना डाले
न सोचा था लेखक बनु में
न सोचा था पाठकों के दिलों पर राज करूं मैं
कहीं इस राज को ही न जगा डालें
कहीं मेरी किस्मत मुझे लेखक ना बना डाले
पढ़ता था दिन-रात उस लक्ष्य के लिए में
दिखता था वह लक्ष्य दीए में
कहीं उस लक्ष्य के दीए को ना बुझा डालें
कहीं मेरी किस्मत मुझे लेखक ना बना डाले
आते हैं आंसू मेरी आंखों में
पड़ जाता हूं लक्ष्य की बातों में
कहीं उस लक्ष्य को ही न जला डाले
कहीं मेरी किस्मत मुझे लेखक ना बना डाले
छुड़ाने को इससे पीछा पूछता हूं लोगों से
हर बात इसकी छुपाता हूं लोगों से
कहीं इस बात को लोगों से ना कह डालें
कहीं मेरी किस्मत मुझे लेखक ना बना डाले
दिल में उमंग लिखने की क्यों उठा आई
लिखने लगी यह लेखनी न शरमाई
कोई इस शर्म को इसके सर पर चढ़ा डालें
कहीं मेरी किस्मत मुझे लेखक ना बना डाले
फिर से कोई उस लक्ष्य से जुड़ा डालें
थे शब्द मेरे मन में लिख डाले
था कुछ और लक्ष्य मेरा
कहीं मेरी किस्मत मुझे लेखक ना बना डाले

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मै प्रवीन राजपूत उत्तर प्रदेश से हू और मैं हास्य, वीर, श्रंगार रस पर कविता लिखता हूँ मोबाइल 6396962008, मेरा एक यूट्यूब चैनल है जिसका नाम है Free education pk वेबसाइट https://freeeducationpk97.blogspot.com/?m=1

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