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मॉ का आंचल – मनोज कुमार

दुनि‍या में एसा कुछ नही जो मॉ के आंचल में ना हो
वही बस अभागा है जो इस आंचल का ना हो

भगवान के घर जाते हो क्‍या मांगने
मॉ देती है बि‍न मांगे

जरा सोचाे अगर मॉ हमसे मांगेगी कभी कुछ
तो क्‍या मांगेगी
की हम सलामत रहे और अपना ख्‍ायाल रखें

उसे कि‍सी और चीज का शौक नही
बच्‍चो के सर पर हाथ सहलाने की आदि‍ है
तूफानो की कस्‍ती है जि‍न्‍दगी
शुक्र समझो की मॉ मांझी है

घर के पीछवाडे आम के पेड के नीचे
कुछ उदेडबून में लगी बैठी है
ब्‍याह कर ससूराल गई
मॉ कि‍तनी बोली
सोचती है
की अब भी उसकी लाडली
नादान सी बच्‍ची है

उसे मालूम नही दूध कब उफान लेगा
सरसो का साग बनाने में कि‍तना तेल लगेगा
गोंदते वक्‍त आटे में कि‍तना पानी जाना है
ससूराल की वो बुलबुल
कही भूल ना जाये कि‍ पीहर भ्‍ाी आना है
सास बडी कडक बोली की है
ननद तीखी छुरी है
क्‍या सबका दि‍ल जीत पायेगी
नि‍यत तो उसकी सच्‍ची है
क्‍या बच्‍चो की जि‍म्‍मेदारी संभाल पायेगी
अभी तो वो खुद भी बेचारी बच्‍ची है

बदकि‍स्‍मत है वो लाेग जि‍नकी मॉ वर्धाश्रम में रहही है
सच तो यही है की
उस वातावरण में सम्रद्धि की बयार बहती है
जि‍स ऑगन में एक मॉ रहती है

मनोज कुमार
जयपुर राजस्थान

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Ravi Kumar

Ravi Kumar

मैं रवि कुमार गुरुग्राम हरियाणा का निवासी हूँ | मैं श्रंगार रस का कवि हूँ | मैं साहित्य लाइव में संपादक के रूप में कार्य कर रहा हूँ |

6 thoughts on “मॉ का आंचल – मनोज कुमार”

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