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माँ की गुहार-डॉ संजना भू

नयन की धारा है कहती,
विरह की मारी तुम लगती.
ढूँढते किसके पगरज को,
तपती धूप में जलती.
यहाँ तेरा न कोई क्या,
जिसे तुम दर्द बतलाओ.
हृदय के सुप्त भावों को,
सम्मुख कहके आ जाओ.
मेरी आँखों का तारा था,
दुखों का वह सहारा था.
मेरे सुख का भी साथी था,
जिस पर सब कुछ वारा था.
मेरी ममता की छाया को,
लगी ऐसी नजर किसकी.
छिना गोदी का वह साया,
हुई थी वर्षों मैं जिसकी.
कहाँ जाऊँ कहाँ ढूँढू,
जाकर किससे मैं पूंजी.
कोई न बतलाये कुछ भी,
कोसती भाग्य खुद सोचू.
हुआ था पाप कोई तो,
जो वात्सल्य को तरसती मैं.
लेकर ममता का आंचल,
मारी मारी फिरती मैं.
हे भगवन् कुछ तो बतलाओ,
कोई पथ भी तो दिखलाओ.
देकर अपने दर्शन को,
पुत्र दर्शन भी करवाओ.

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