माँ तेरे हाथों की रोटियां – शुभम् लांबा

माँ तेरे हाथों की रोटियां – शुभम् लांबा

Subham Lambaमाँ तेरे हाथों से बनीं रोटियां ही भुख मिटाती हैं,
खुद के हाथ से बनीं रोटियां तो सिर्फ पेट भरती हैं।
तेरे फुल्के की खूशबू घर जल्दी आने का बुलावा देती है,
और तेरे हाथ से बनीं दाल रोटी भी five Star का खाना भी फिका़ कर देती है।

तेरे साथ खाना खाना अंतर आत्मा को सूकून देता है,
अकेले बैठ कर खाना जिम्मेदारी का एहसास दिलाता है।
तेरे साथ वक़्त बिताना मेरे दिल को आराम देता है,
अकेला रहना मजबूरियों का एहसास दिलाता है।

तेरे बातों की महक तुझसे मिलने को प्रेरित करती है,
और तेरे दुलार की संवेदना बाकी रिश्तों को भी मजबूत कर देती है।
माँ पता नहीं क्या जादू है तेरे हाथों में‌,
तेरे हाथों से बनीं रोटियां ही भुख मिटाती हैं,
खुद के हाथ से बनीं रोटियां तो सिर्फ पेट न भरती हैं।
….$❤️….✍️

#शुभम् लांबा

Ravi Kumar

मैं रवि कुमार गुरुग्राम हरियाणा का निवासी हूँ | मैं श्रंगार रस का कवि हूँ | मैं साहित्य लाइव में संपादक के रूप में कार्य कर रहा हूँ |

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