माँ मैं तेरी परछाँई हूँ- अशोकदीप

माँ मैं तेरी परछाँई हूँ- अशोकदीप

माँ मैं तेरी परछाँई हूँ

कब कुल मान घटाया मैंने
कब रिश्तों के बाद उजाड़े ?
माँ मैं तेरी परछाँई हूँ
क्यों घोट कोख में तू मारे ?

मैं जो तेरे पेट समाई
है दोष बता क्या मेरा माँ ?
बिन निकले ही सूरज जग में
होता है कहांँ सवेरा माँ ?

पूछ गिराने वालों से तू
मैं क्या खुद मर्जी से आई ?
क्या बादल बिन चमकी बिजली
या कली लता बिन मुस्काई ?

क्या बिन बोए जौ मिट्टी में
फूटे अंकुर हुए जवारे ?
माँ मैं तेरी परछाँई हूँ
क्यों घोट कोख में तू मारे ?

मत बैठाना कांधे अपने
उँगली पकड़े मैं चलूँगी
दूध मलाई कुछ मत देना
बासी टुकड़ों पर पललूँगी

ना लाना तू घघरी चोली
ना फ्रॉक फूल की पहनाना
सींकर अपने उतरे कपड़े
इक झबला बस तू लटकाना

जो माँगू में कांच खिलौने
दिखला देना तू नभ तारे ।
माँ मैं तेरी परछाँई हूँ
क्यों घोट कोख में तू मारे ?

दादी बुआ और पापा से
मैया भोली तू मत डरना
सह लेना बारिश तानों की
ढेलों की नाईं मत गलना

पल दो पल का गुस्सा है माँ
पल दो पल में मिट जाएगा
आज उठा जो अंधड़ घर में
दिन कितने वो टिक पाएगा ?

इक-दो दिन गरजेगा बादल
इक-दो दिन बरसेंगे धारे
माँ मैं तेरी परछाँई हूँ
क्यों घोट कोख में तू मारे ?

जानूँ मैं तू जनना चाहे
अपने प्राणों की लाली को
क्यों काटेगी हाथों अपने
पोषा तूने जिस डाली को

आज पतंग तू डोर बंधी
तेरी उड़ाने कहाँ मन की
जितने रील तुझे दे चरखी
उतनी तेरी सैर गगन की

छोड़ और के हाथों उड़ना
तोड़ घुटन के बंधन कारे ।
माँ मैं तेरी। परछाँई हूँ
क्यों घोट कोख में तू मारे ?

 

अशोकदीप
जयपुर, रास्थान

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