मानव धर्म-दीप जांगड़ा

मानव धर्म-दीप जांगड़ा

मनै तै तू चाँदणा दिखाई जा भला तारयां का मैं के करूँ गा
आपणे ज्ञान के समुन्दर मैं डबौ ले किनारयां का मैं के करूँ गा
दो जून की रोटी सुख की खुवाई जा भंडारयां का मैं के करूँ गा
सर पै हाथ तूँ राखीये सच्चे मालिक सहारयां का मैं के करूँ गा

दुःख दे सुख दे वा तै तेरी मर्ज़ी है पर हौंसला ना टूटण दिए
शोहरत दे दौलत दे जितणी चाहे पर यें आंख ना उठण दिए
दुश्मन चाहे सारा जमाना बणा दे तूँ पर नाड़ ना झुकण दिए
चाहे दुनिया मैं मेरा नाम चालज्या प्रभु ऊपर नै ना थूकण दिए

ज़मीर मरण लाग जया तै साम्भ लिए मनै उड़ै रोक लिए
किसे माड़े नै सताऊं कदे तो तू बेशक मेरी सांस शोक लिए
झूठ की राह पै पैर चल्या जा तो उसे टेम मेरे बोल मौक लिए
पैडाँ पर तै पाँ ना उकण दयूं मालिक चाहे तेल मैं झोंक लिए

मर्यादा मैं राखिये हमेशा मनै कदे ज्यादा मुँह ना बाण दिए
बालक हूँ किते भीज ज्यां मोह मैं तू अपणी छतरी तांण दिए
भेद ना करूँ ऊंच नीच मैं इतणी सी तै मनै जरूर जाण दिए
रुल ना जाऊं दुनिया की भीड़ मैं मौला थोड़ी सी स्याण दिए

जीतूँ तै बेशक़ ना पर हार नै ओटण की हिम्मत राखिये
घणा अहंकारी भी ना बणण दिए मेरी सोच नै सीमत राखिये
माड़े कर्म तै टालिए अर थोड़ी सी आच्छे कर्म की क़ीमत राखिये
तेरे चरणां मैं पड़्या सूँ जिसा सूँ भगवन थोड़ी सी रीमत राखिये

घणा अंधेरा सै इस राह पै मनै ग्यान का “दीप” दिखाता रहिये
चाहे छाले पड़े जाओ मेरे पायाँ मैं तू मनै सीधी चलाता रहिये
ओगुणी हूँ नोसिखिया बालक मनै भीड़ पड़ी मैं सिखाता रहिये
मनै क़लम संभालणी ना आवै राम सहज सहज लिखाता रहिये

भाईचारे मैं राज़ी रह लयूंगा मनै इस राजनीति तै बचा लिए
दुनिया मीठी बण कै डसै सै तू मनै झूठी प्रीति तै बचा लिए
थोड़े मैं सार लयूं संतोष राखिये अर माड़ी नीति तै बचा लिए
घर खोवण की होवै दुत्ती हे ईश्वर दीप नै लाई लीति तै बचा लिए

चाहे टोटा रहण दिए घर मैं पर मनै धोखे के व्यापार तै बचाईये
यें तै वोटां के लालची है तू इसी इसी उज्जड सरकार तै बचाईये
दुनिया हांसी करै है ग़रीब मज़बूर की इसनै अत्याचार तै बचाईये
किसे कै पाड़ ला कै घर ना भरणा हे स्वामी ग़रीबमार तै बचाईये

 

दीप जांगड़ा

Deep Jangra

मैं दीप जांगरा कैथल हरियाणा का निवासी हुँ। मैं वीर रस का कवि हूँ।

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