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मैं एक जोकर-गोपाल-दानसेना

एक महफिल सजी हो
सब मुस्करा लेते हैं ।

दुसरों के हरअंदाज पे
सब ताली बजा लेते हैं।

पर सबके जेहन में
एक कोना छुपकर होता है।

जिसके खातिर जीवन में
सबको रोना अक्सर होता है।

फिर रंग मंच में ये
ठहाके कैसा है।

सब भूल प्रपंच में
जीवन जोकर जैसा है।

तो सब गम भूला कर
हम भी चल पड़े कुछ रोकर।

सब महफ़िल हंस रही
मैं भी दो गुना हंस दिया
बन जैसे जोकर।

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