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// मन का पंछी //- चिन्ता नेताम ‘मन’

दिल का भोला , तन का छोटा ,
रंगत इसका तितली जैसा है ।
कभी यहां फुदकता रहता ,
कभी यहां से उड़ जाता है ।
जहां मिला है दाना इसको ,
वहीं बसेरा कर लेता है ।।

आंखे है इसकी पानी जैसी ,
हर रंगों से मिलती है ।
पर इसमें है किसने झांका ,
आंसू पल -पल ढलती है ।
बहती है तब झरना लगता ,
रुकती तब सागर जैसा है ।।

उड़ते -उड़ते थक सा जाता ,
कहीं रुकने का नाम ना लेता ।
हर उड़ान पर आंधी है ,
और मंजिल पाने की आशा है ।
पर नादान है यह क्या जाने ,
कि मंजिल मेरा कैसा है ?

कभी आसमान में उड़ता है तो ,
सितारों से दोस्ती करता है ।
पर सितारों की महफिल में वह ,
खुद को तन्हा पाता है ।
फिर तन्हाई में चुपके – चुपके ,
चुपके से रो लेता है ।।

जीवन के सफर में ,
अरमां है बस इसकी ऐक ,
उड़ते – उड़ते मिल जाए ,
इसको कोई शिकारी नेक ।
मन में अपना जाल बिछा कर ,
कर ले इसको कब्जे में ।
रख ले इसके पंख कुतरकर ,
अपने मन के पिंजरे में ।।

              * चिन्ता नेताम ' मन '

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