मंजिल की तलाश – शोभा(सृष्टि)

मंजिल की तलाश – शोभा(सृष्टि)

सपनों की अपनी दुनिया, दुनिया के अपने रंग।
रंगों की अपनी छटा, छटा देख हो जाते दंग दंग रह जाती देख के दुनिया, हम भी नहीं किसी से कम। कमतर अपने को समझना तेरी भारी भूल है, प्यारे।
भूल कब किसी से नहीं होती है अब तो इसे सुधार ले, प्यारे।
अब तो नित नए सुधार किए जा, अपने को स्वीकार किए जा ।
चलता चल सही राह पर अपने को सच्चा राहगीर बना।
माना रास्ता बहुत लंबा है जाने कब पूरा होगा।
हिम्मत से तू डटा रहा तो एक दिन यह पूरा होगा।
चलता चल इसी राह पर समय नहीं अब रुकने का।
बाधा को झुका दे प्यारे, समय नहीं अब झुकने का ।
मंजिल अगर नजर आने लगी है तो निश्चय ही मिल जाएगी।
अब अगर हताश हुआ तो यह तलाश अधूरी रह जाएगी।

–शोभा(सृष्टि)

Ravi Kumar

मैं रवि कुमार गुरुग्राम हरियाणा का निवासी हूँ | मैं श्रंगार रस का कवि हूँ | मैं साहित्य लाइव में संपादक के रूप में कार्य कर रहा हूँ |

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