मंजिल- शोभा सृष्टि

मंजिल- शोभा सृष्टि

मंजिलें नहीं मिलती केवल सोचने भर से
मंजिलों तो मिलती है अनगिनत प्रयास से ।
मंजिल पर छाई अभी बंधनों की छायाँ है
मंजिल पर छाया अभी खौफनाक साया है।
मंजिलें कभी नहीं रखती हिसाब बेवजह के कारणों का मंजिले तो कदम चूमती है
बेखौफ खतरों के सिकंदरो का।

 

शोभा सृष्टि
 राजस्थान

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