मानसून से मन्नत…..मंगल प्रताप चौहान

मानसून से मन्नत…..मंगल प्रताप चौहान

ये काले बादल भी,
अब स्वांग रचने लगे हैं,
ये मेघदूत की अविचल किरणें ,
अब राग रचने लगी हैं।
मानो “मंगल” की कुटिया भी,
सुशोभित हो रही इन बूंदों से,
मेरे मन में भी सजनी के ,
अधूरे ख्वाब सजने लगी हैं।।

मेरे मन की बगिया में भी ,
अब कुंजन होने लगी है,
बच्चे दौड़ रहे बागों में उनकी ,
मिठी गुंजन होने लगी है।
ये ग्रीष्म ऋतु की रेवती नक्षत्रा,
मन में अनुपम राग उत्पन्न कर रही,
अब यूं लगता है जैसे मेरे मन की,
अधूरी मन्नत पूरी होने लगी हैं।।

Mangal pratapसूर्यवंशी मंगल प्रताप चौहान
राबर्ट्सगंज सोनभद्र।

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