मीठा बचपन -कविता यादव

मीठा बचपन -कविता यादव

बचपन की अठखेलिया बचपन की शरारत
भूलना यू आसान है ,पर बीत चूका जो बचपन
भूलना ना मुमकिन है ……..
बचपन की गुड़िया ,बचपन के खिलोने
भूलना यु आसान है ,पर बीत चुकी जो मस्ती
भूलना ना मुमकिन है ……..
बचपन का वो घर – घर का खेलना ,और पिड्डू का खेलना
भूलना यु आसान है ,पर मम्मी का चिल्ला के बुलाना
भूलना ना मुमकिन है ……..
वो छोटे-छोटे कप प्लेट से यु ही चाय बनाना
भुलना यु आसान है ,पर वो चाय सबको पिलाना
भूलना ना मुमकिन है ……..
अपने-अपने घर से खाने की चीज़े लाना और मिलकर उसे खाना ,
भूलना यु आसान है पर गुस्से से अपनी चीजें वापिस ले जाना
भूलना ना मुमकिन है …….
क्रिकेट खेलकर या फुटबॉल खेलकर गेंद से सबको तंग करना ,
भूलना यु आसान है पर गेंद ना देने पर सब से झगड़ना
भूलना ना मुमकिन है …..
बचपन की प्यारी – प्यारी मीठी सी यादे भूलना यु आसान है
पर बचपन के प्यारे दोस्त और छोटी बहन का ख्याल और बड़े भाई का डर यूही भुलाना ,
भूलना ना मुमकिन है ……..

 

कविता यादव 
 भोपाल, एम.पी.

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