Notification

अपने लेख प्रकाशित करने के लिए यहाँ क्लिक करें!

मेरा वो बच्चपन – नवीन

याद है मुझे मेरा वो बच्चपन,
नैनो में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से,
वो तस्वीर उभरकर रक्त की भाति,
मेरे तन मन को छन से जकर लेता है
तब मेरी आंसू मेरे बच्चपन की दुहाई देता है-

मिट्टी में सने उस नाजुक बदन पर,
माँ का नहलाना और प्यार से डाटना,
गिरते पैरो को संभालना,
और हाँथ पकरकर चलना सिखाना,
भूख से रोते देख माँ का समझा,
और गोद में लेकर दूध पिलाना,
जाड़े में रात को माँ से सटकर सोना,
और आधी रात को लापरवाही से लात मारना,
फिर माँ का जगना, लोरी सुनाना, तब सोना
याद है मुझे मेरा वो बच्चपन।

अपने संग दादा को तुतला बनाना,
पेट पर बैठकर किस्से कहानिया सुनना,
बीच बीच में खिलखिलाना और धीरे से सू सू कर देना,
ठंड कपडो में रोने लगना,
हाँथ फैलाकर माँ की तरफ झुकना,
छाती से लिपटना, कपडे बदलवाना, दूध पीना,
और गोद में ही सो जाना,
याद है मुझे मेरा वो बच्चपन।

सुबह देर तक सोना, पापा की डाट से जगना,
माँ से स्कूल ड्रेस पहनना,
बैग, लंच बॉक्स और ऊँगली पकर कर स्कूल छोरना, तब पढ़ना
याद है मुझे मेरा वो बच्चपन।

लेकिन अब न माँ रही, न दादा रहे, न पापा,
न वो पुराना घर रहा, न खेल का मैदान रहा, न बैथान रहा,
रहा तो सिर्फ मेरे अतीत और मेरे बीवी बच्चे,
लेकिन अफ़सोस, नही रहा मेरा वो बच्चपन,
याद है मुझे मेरा वो बच्चपन।

Naveenनवीन
(मुंबई)

87 views

Share on

Share on whatsapp
WhatsApp
Share on facebook
Facebook
Share on twitter
Twitter
Share on linkedin
LinkedIn
Share on email
Email
Share on print
Print
Share on skype
Skype
Ravi Kumar

Ravi Kumar

मैं रवि कुमार गुरुग्राम हरियाणा का निवासी हूँ | मैं श्रंगार रस का कवि हूँ | मैं साहित्य लाइव में संपादक के रूप में कार्य कर रहा हूँ |

Leave a Reply

जागो और अपने आप को पहचानो-प्रिंस स्प्तिवारी

मैंने सुना है कि एक आदमी ने एक बहुत सुंदर बगीचा लगाया। लेकिन एक अड़चन शुरू हो गई। कोई रात में आकर बगीचे के वृक्ष

Read More »

Join Us on WhatsApp