महानगर- नुज़हत राणा रूही

महानगर- नुज़हत राणा रूही

बीते कल को गले से लगाए है सड़कें ।
जिस पर चिंटियों सी सरकती है नगर।
लोग ऐसे है जमे जैसे तलछट ।
शहर है खाली हरियालियों से ।
लोग है खाली ज़ज्वातों से ।
जीवन के नैसर्गिक भवनाओं से खारिज।
है जहन बनी ईटों के घरौंदों में ।
जहरीली हवा में पनपती है कलियाँ
जहाँ हर रिश्तों के बुनियाद है अध खीले ।
ऋतुयों के गीत है यहाँ अधुरे ।
सच्चाई को पाने के लिए ,
जीवन यहाँ खंडरों में है भटकता ।

   नुजहत राना रूही

      सऊदी,अरब

0

Leave a Reply

Create Account



Log In Your Account