मिलता क्या है- निशांत कुमार “नयन “

मिलता क्या है- निशांत कुमार “नयन “

उन बारिश की बूंदो से पूंछू ,
मिलता क्या है- उसे यूँ हीं बरश के ….!

उन सूरज की किरणों से पूंछू ,
मिलता क्या है – उसे यूँ हीं मेरे घर तक आ के …!

उस मधुर ध्वनि की कोयल से पूंछू ,
मिलता क्या है – उसे यूँ हीं मुझे नींदो से जगा के ….!

उस सागर की लहरों से पूंछू ,
मिलता क्या है – उसे यूँ हीं सबकी प्यास बुझा के ….!

उस बेबस टूटे तारों से पूंछू ,
मिलता क्या है-उसे यूँ हीं सबकी आस बढ़ा के …!

उस पीपल की टहनी से पूंछू ,
मिलता क्या है -उसे यूँ हीं धूपों में बाहें फैला के ……!

उस हवा के झोंको से पूंछू ,
मिलता क्या है -उसे यूँ हीं कानो में गन -गुना के ….!

उस निःसहाय अबला से पूंछू ,
मिलता क्या है -उसे यूँ हीं सबका मन बहला के …!

उस बूढ़े बापू से पूंछू ,
मिलता क्या है -उसे यूँ हीं सरे घर का बोझ उठा के ..!

उस माँ से भी पूंछू ,
मिलता क्या है – उसे यूँ हीं अपने हिस्से की रोटी अपने बच्चों को खिला के ..!

निशांत कुमार “नयन “

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