मुरझाहट भी ज़रूरी है-रोहिताश सिंह

मुरझाहट भी ज़रूरी है-रोहिताश सिंह

फूलो से खिलना सिखकर जब वीराने जंगलो में पहुँचा
तब पता गुमनामी की भी अपनी एक ताकत
जिसको मैं आज तक अंधकार मानकर बैठा था
आज फिर वही से जीवन की शुरुआत होगी
इसका मुझे जरा भी इल्म न था
मैं अकेला बैठा वह बस यही सोचता जा रहा था कि आगे क्या होगा इस अंधेरे में न कोई मंजिल है
और न कोई आगे बढ़ने का रास्ता
दूर दूर तक कोई किनारा न मिला इस कसती को,
तो ठान लिया इस अकेले मुसाफिर ने
की इस डगर पर रुक जाना ही मुनासिब होगा
और अपने पूर्वानुमान को विराम देते हुए निसबद एक साँस लेकर खुद दिलाशा दी,
अब मैं सांतचित था मेरा मन उस सुबह की विभोर का ईतजार कर रहा था जो मुझे
रास्ता दिखाने वाली थी
मेरा सब्र की सीमा समाप्त हुई
सवेरा मेरे सामने था,
जाते जाते अधकार सिखाकर गया,
मालिक खिलते रहने से ही जीवन ,
मुस्कुराहट के साथ साथ मुरझाहट भी जरुरी है

 

   रोहिताश सिंह

अलवर राजस्थानर

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