नदी से सिख-पुष्कर कुमार

नदी से सिख-पुष्कर कुमार

कल कल करती धारा नदी का
बहती जा रही वह देखो

पर्वतो से निकली
हरी-भड़ी खेतो को सिंचती
बड़े बड़े शहरो से होकर
बढती है,आगे की ओर।

रूकना इसे नही आती
थकना भी नही आती ।

बड़े-बड़े चट्टानो से टकराती
आँधी-तूफान, बाढ़-बवंडर,
सारा कुछ यह सहती है
फिर आगे की ओर बहती है ।

पंछी, जलचर, थलचर सभी
का आस्र्य यह देती

सिखे हम सब इससे
संघर्ष कितना ही कठिन
क्यो न हो फिर भी आगे
बढना ही जिवन है ।

 

 

 Pushkar Kumar

   पुष्कर कुमार
 दियारी,अररिया

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